ईरान और विश्व की 6 शक्तियों के बीच 2015 में होने वाले परमाणु समझौते में स्नैपबैक का एक ऐसा प्रावधान रखा गया था, जिसके आधार पर अगर ईरान समझौते का पालन नहीं करता है तो इसमें शामिल देश उसके ख़िलाफ़ इस तंत्र को ट्रिगर कर सकते हैं, जिसके नतीजे में ईरान पर संयुक्त राष्ट्र के सभी प्रतिबंध फिर से बहाल हो जायेंगे।
शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ईरान के ख़िलाफ़ 13 साल पुराने हथियारों के प्रतिबंध को आगे बढ़ाने के अमीरीका के प्रयासों को उस वक़्त भारी झटका लगा, जब वाशिंगटन द्वारा लाए गए प्रस्ताव को एक वोट से ज़्यादा नहीं मिल सका और उसके यूरोपीय सहयोगियों ने भी उसका समर्थन नहीं किया।
सुरक्षा परिषद द्वारा अमरीकी प्रस्ताव ठुकराए जाने से सख़्त नाराज़, अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने सुरक्षा परिषद के सदस्यों के इस व्यवहार को क्षमा नहीं करने योग्य बताया तो वहीं राष्ट्र संघ में अमरीकी राजदूत केली क्राफ़्ट ने प्रतिबंध लगाने के लिए किसी भी हद तक जाने की क़सम खाई।
शुक्रवार को सुरक्षा परिषद में मतदान से एक दिन पहले अमरीका ने परिषद के सदस्यों के बीच एक ज्ञापन वितरित किया था, जिसमें उन्हें यह आश्वासन देने की कोशिश की गई थी कि 2018 में एकतरफ़ा तैर पर समझौते से निकलने के एलान के बावजूद, वह अभी भी इस ऐतिहासिक समझौते का हिस्सा है, जिसे अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प अब तक का सबसे बुरा समझौता बताते रहे हैं।
ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि इस तरह का कोई भी क़दम ग़ैर क़ानूनी होगा और सुरक्षा परिषद में मतदान के नतीजे से साबित हो गया है कि वाशिंगटन अब दुनिया में पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया है।
राष्ट्र संघ में ईरान के राजदूत मजीद तख़्त रवान्ची ने चेतावनी दी है कि अमेरिका को इस पराजय से सबक़ लेना चाहिए। उन्होंने ट्वीट करके कहा कि प्रतिबंधों को फिर से बहाल करने की उसकी कोशिशों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ठुकरा दिया है।
उन्होंने कहा कि अगर अमरीका अपनी धमकी पर अमल करता है तो यह तेहरान पर निर्भर करेगा कि कब और किस तरह से जवाब दिया जाए और इसके लिए हमारे पास सभी विकल्प खुले हुए हैं।